कहते हैं कि इंसान उम्र में चाहे जितना बड़ा हो जाए, उसका दिल हमेशा बच्चा ही रहता है । यूनिवर्सिटी की लाइफ जीवन में हर दिन कुछ नया लेकर आती है—नई चुनौतियां, नए मौके और नए रिश्ते। लेकिन इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी के बीच एक बात हमेशा खास रहती है: हमारा दिल। चाहे हम कितने भी बड़े हो जाएं, “दिल तो बच्चा है जी” ये कहावत हमें याद दिलाती है कि दिल की मासूमियत कभी खत्म नहीं होती।
एक स्टूडेंट के तौर पर, दिल का बच्चा होना हमारी सबसे बड़ी ताकत है। वही बच्चा है जो हमें देर रात तक पढ़ाई के बाद भी दोस्तों के साथ हंसने की ताकत देता है। वही दिल है जो छोटे-छोटे पलों में खुशी ढूंढ लेता है—जैसे दोस्तों के साथ मैगी खाना या लाइब्रेरी में किसी पसंदीदा किताब का मिल जाना।
लेकिन कभी-कभी यह बच्चा जिद्दी भी हो जाता है। जैसे एग्ज़ाम्स के प्रेशर के दौरान सबकुछ छोड़कर सिर्फ सोने का मन करना । तब हमें इस बच्चे को संभालना और समझाना पड़ता है।
यूनिवर्सिटी के सफर में, दिल का बच्चा रहना ज़रूरी है। यह हमें नई चीज़ें सीखने, गिरकर फिर उठने और सपने देखने की हिम्मत देता है। क्योंकि आखिरकार, यही मासूमियत हमारी ज़िंदगी को खुशनुमा और खास बनाती है।